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Blessings from the President

The School in itself takes pride not only in fostering the academic excellence but also undertaking the physical, mental and spiritual care of your child so as to broaden one outlook and make the child useful to the society and nation at large as well as a beloved child of the Almighty. We firmly believe that education should be for life, not just for a living. The core value of this school is not on cultivating the child for the purpose of a livelihood but for the life itself. At this school the child will learn about cultures, customs and religions of other people in order to appreciate the universal oneness through a Stimulating value based learning experience. I hope to have an opportunity to welcome you and your child at a place where a child will learn grow with divinity.

H.D.H. Sadhu Hariprasad dasji
President,
YDS inspired Sarvoday Kelavani Samaj,
Rajkot.

Message From Honorary Secretary

Atmiya School is a Modern Gurukul where every child is given an opportunity to enjoy his childhood as learning is made a joyful experience. It is a primary school based on universal values that are the core values of all faiths and cultures. Rather than limiting to any particular religious group. We believe that no child is fully educated unless he learns to read himself hence here at ur school we do not teach the child but just help him learn. The child here is helped to lead a value oriented life so as to understand the Indian culture & heritage. The school campus is spread over 23 Acres of pollution free environment with lush green surroundings and beautiful Landscapes that create a perfect learning environment. The school is dedicated to the divinity in every child and hence I welcome you all as your search for a good school ends here.

Sadhu Tyagvallabhdas
Honorary Secretary,
YDS inspired Sarvoday Kelavani Samaj,
Rajkot.

Values @ATMIYA

मनन का महत्त्व
प्रकृति में चार अवस्थाएं हैं - पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था, और ज्ञानावस्था। विकल्पात्मक विधि से सहअस्तित्व समझ में आने के बाद चार अवस्थाओं का ऐसे नामकरण करना संभव हुआ. चार अवस्थाओं का नाम आपने सुना है, उनको समझना 'अध्ययन विधि' से होता है. रूप, गुण, स्वभाव, धर्म का अध्ययन होता है. जीवन इनको पहचानता है. रूप को भी जीवन ही पहचानता है. चारों अवस्थाओं के रूप को पहचानने में विश्वास हो गया है. इनके गुण, स्वभाव और धर्म स्पष्ट होने के लिए अध्ययन ही एक मात्र विधि है. अध्ययन पूर्वक हर अवस्था का रूप, गुण, स्वभाव, धर्म स्वीकृत होता है, साक्षात्कार होता है, अनुभव होता है और आगे की पीढ़ी के साथ प्रमाणित होता है.
सूचना इन्द्रियों से आती है. भाषा स्वीकार होकर चित्त में चित्रित हो जाता है. भाषा से अस्तित्व में वस्तु इंगित होती है. वस्तु में रूप-गुण-स्वभाव-धर्म अविभाज्य रूप में वर्तमान होता है. हर अवस्था में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म का क्या स्वरूप है, वह आपके सम्मुख सूचना प्रस्तुत करते हैं, और उसको जाँचने (निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण) का काम आपके लिए छोड़ देते हैं. जाँचने पर आपको पता चलता है - हर इकाई में रूप, गुण, स्वभाव, धर्म होता ही है.
जो हम समझे हैं, उसको आपके लिए 'सूचना' रूप में प्रस्तुत करते हैं - जो सारी वास्तविकताओं के रूप, गुण, स्वभाव, धर्म का विश्लेषण है. यह विश्लेषण आपके लिए पहले 'सूचना' है, फिर 'सोच-विचार' है, उसके बाद रूप और गुण का चित्रण है, फिर स्वभाव और धर्म का साक्षात्कार है. इस तरह चित्त के दो भाग हैं - एक भाग जिसमे चित्रण होता है, दूसरा वह जो चित्रण की सीमा में नहीं आता। चित्रण भी हो, साक्षात्कार भी हो - समझने की स्थली यहाँ है.
ये चारों अवस्थाएं रूप, गुण, स्वभाव और धर्म के संयुक्त रूप में हैं - इसमें से रूप आपकी आँखों में दिखाई पड़ता है, इससे आपने स्वीकार लिया कि ये चारों अवस्थाएं हैं. ये चारों अवस्थाएं अस्तित्व में हैं. व्यापक वस्तु में सम्पृक्त प्रकृति के रूप में चार अवस्थाएँ हैं. हर अवस्था का अपने स्वरूप में होना है. होने के रूप में शाश्वत है - यह साक्षात्कार होता है.